जय भारत

जय भारत
मेरा फोटो
बडसर, हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश, India
जन्मः ०७-जुलाई १९८० को हमीरपुर जिला, हिमाचल प्रदेश में। प्रारंभिक शिक्षा गाँव के सरकारी पाठशाला में हुई। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से २००१ में स्नातक । १९९८ में कविता लिखना शुरू किया था। काफी कविताएँ व लेख हिमाचल केसरी, भुवनेश्वर बुलेटिन (साप्ताहिक, नवभारत टाइम्स (वेबसाईट) व अनुभूति में छप चुके हैं। ई मेल- sonu777p@gmail.com

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

दयनीय दशा है





दयनीय दशा है भारत की
बह रही गंगा स्वार्थ की
भला-भलाई मृत पडे हैं
अर्थी उठ रही परमार्थ की
         दयनीय दशा है भारत की ।।
अपना सब को स्वार्थ दिखता है
अब लेखक खुद के खातिर लिखता है
माना पहले थी दास प्रथा
पर आज खुद देखो इन्साँ बिकता है

इन्साँ का हृदय पत्थर हुआ है
और करता बात यथार्थ की
भला-भलाई मृत पडे हैं
अर्थी उठ रही परमार्थ की
         दयनीय दशा है भारत की ।।

सुशील कुमार पटियाल

सोमवार, 22 अगस्त 2011

भारत मां की इज़्जत

जब मां की इज़्जत लुट रही हो, तो क्या उसके बच्चों को चुप-चाप तमाशा देखना चाहिये या फिर आतताइयों से मुकवला करके उनका अन्त करना चाहिये?

मेरे ख्याल तो हर कोई अपनी मां के लिए लडना चाहेगा चाहे उसकी जान ही क्यों न चली जाए।
दोस्तो आज वही दिन हमें देखने को मिल रहा है, इन भ्रष्ट नेताऒं ने हमारी भारत मां के साथ बदसलूकी की है तो हम चुप कैसे बैठ सकते है।

इन नेताओं ने तो अपना दीन, धर्म, ईमान सब कुछ बेच रखा है।। ये लोग अपनी ही मां की इज़्ज़त लूट रहे हैं इससे बडी शर्म की बात इस देश के लिए क्या हो सकती है।।

इन नेताओं को हमने चुन के भेजा की ये हमारी भारत मां इज़्ज़त मान बढायेंगे, मगर आज तश्वीर आप के सामने है।। मुझे ये सोच के ताज़्जुब होता है कि अन्ना हजारे, बाबा रामदेब जो देश कि बात करते रहे है और जिनके पीछे आज जन सैलाब उमड पडा है, ये सरकार उनके साथ ही बससलूकी कर सकती है तो इस देश में उस आम आदमी की ये सरकार क्या दशा कर सकती ये सोचते हुए भी डर लगता है।

बस यही एक कारण है कि इस देश का आम आदमी अपनी शिकायत दर्ज करवाने से भी डरता है।।

तो आखिर में, मैं यही कहता हुं -
उठो, जागो ऐ देश के पहरेदारो
नहीं तो लुट जाएगा ये यारों
अगर मां की इज़्ज़त भी नहीं बचा सकते
तो तुम्हें लानत है, इस देश के गद्धारो।।

शनिवार, 20 अगस्त 2011

कैसा देश!

ये कैसा देश हमारा है
जहां मरता गरीब बेचारा है
ठोकर मिलती है हर उसको
जिसका नहीं कोई सहारा है।।

तडफ-तडफ के मरते देखो
धनवान से निर्धन डरते देखो
यहां जान की कीमत नहीं है कोई
दिखता हर कोई हारा है।।

हर चीज़ पे बोली लगती है
पर गरीब पे गोली चलती है
नहीं मिलता कुछ भी उधारा है
ये कैसा देश हमारा है।।

टूटते रिस्ते



इन्सां - इन्सां से दूर हो रहा
अब तो घाव ये नासूर हो रहा
सजा-सजा रखे थे अरमां
अब तो हर अरमां है चूर हो रहा।।

सोमवार, 9 मई 2011

बेडियाँ

दूर गगन की छाँव में,
बँधी हैं बेडियाँ पाँव में
जहाँ नहीं कोई भी वंधन हो
बस प्रेम प्यार ही बंदन हो
चलो रे मन उस गाँव में
दूर गगन की छाँव में,
बँधी हैं बेडियाँ पाँव में ।।

सुशील कुमार पटियाल

यह कविता मेरे द्वारा जून १७, २००७ को लिखी गई थी।।

मन्दिर, मस्जिद और इन्सान

मन्दिर जाऊंगा
गुरूद्वारे जाऊंगा
मस्जिद जाऊंगा
और जाऊंगा मै चर्च
मेरा भला क्या जाऐगा
क्या होगा मेरा खर्च ।।
ईश तुम्ही मैं बसता है
न महंगा न सस्ता है
बस सीधा सादा रस्ता है
मान लो उसको चाहे जैसे
क्या पडता है भला फर्क
मेरा भला क्या जाऐगा
क्या होगा मेरा खर्च ।।


सुशील कुमार पटियाल

यह कविता मेरे द्वारा जुलाई २७, २००८ को लिखी गई थी।।

ईश तुम्हीं

ईश तुम्हीं इन्सान तुम्हीं
मानो तो भगवान तुम्हीं
ग्यान तुम्हीं अग्यान तुम्हीं
तो रब की पहचान तुम्हीं
निर्धन तुम्हीं, धनवान तुम्हीं
गुणहीन तुम्हीं, गुणवान तुम्हीं
अल्हा तुम्हीं और राम तुम्हीं
सुवह तुम्हीं और शाम तुम्हीं
ईश तुम्हीं इन्सान तुम्हीं
मानो तो भगवान तुम्हीं ।।


सुशील कुमार पटियाल

यह कविता मेरे द्वारा फरवरी १२, २००६
को लिखी गई थी।।

एक इन्सान हूँ

न हिन्दू हूँ
न मुसलमान हूं
मैं तो एक एक इन्सान हूँ
मुझ से गीता
बाइबल मुझ से
मैं ही तो कुरान हूं
मै तो एक इन्सान हूँ ।।
धर्म-कर्म के ये हथकण्डे
जीवन जीने के ये फण्डे
मैं इन सब से अन्जान हूं
मै तो एक इन्सान हूँ ।।
राम मिले, न रहिम मिले
ईश मिले, ने अल्हा
मैं इन सब का पैगाम हूं
मै तो एक इन्सान हूँ ।।
ईश्वर भीतर तेरे भी है
ईश्वर भीतर मेरे भी है
बना फिर भी नादान हूं
ईश प्रेम, मैं प्राण हूं
मैं तो एक इन्सान हूं ।।


सुशील कुमार पटियाल

यह कविता मेरे द्वारा जनवरी ०१, २००६ को लिखी गई थी।।

समानता?

कौन कहता है
सब समान हैं
कोई हिन्दू तो,
कोई मुसलमान है
कोई निर्धन तो
कोई धनवान है
कोई निर्बल तो
कोई पहलवान है
कौन कहता है
सब समान है ।।
कोई हैवान तो
कोई इन्सान है
कोई भरा है जीवन से
तो कोई हुआ बेजान है
किसी को मिलता कफन तक नहीं
तो कोई पाता शमशान है
किसी को लगती
समस्या जटिल ये
तो कोई कहता आसान है
कौन कहता है
सब समान है ।।

सुशील कुमार पटियाल

यह कविता मेरे द्वारा जनवरी ०१, २००६ को लिखी गई थी।।

शनिवार, 19 मार्च 2011

मीत मतलब के

यहाँ मीत हैं मतलब के सब सारे
मान के सबको अपना हारे
कदम फूंक-फूंक के रखना
मान ले मेरी बात तू प्यारे्
यहाँ मीत हैं मतलब के सारे ।।
सच है क्या उसको पहचान
भले बुरे का कर ले ध्यान
जो ये आँखें तुझे दिखातीं
मिथ्या हैं ये सारे नज़ारे,
यहाँ मीत हैं मतलब के सब सारे ।।
गहरा गर्त है सामने तेरे
पर तुझ को दिखता नहीं है
दिखता है जो इन आँखों से
कहता है बस वही सही है
होता अगर बस यही सही तो
क्यों फिरते यूँ मारे-मारे
यहाँ मीत हैं मतलब के सब सारे

ये कविता २९ - ०६ - २०१० को लिखी गई थी। सुशील कुमार पटियाल

मौत का मातम

मौत का मातम मनाने का
अब वक्त भला है किस को
अंधों कि ये दौड लगी है
देख लो चाहे जिस को
मौत का मातम मनाने का
अब वक्त भला है किस को

सुशील कुमार पटियाल

बुधवार, 10 फरवरी 2010

मिथ्या अभिमान

मौत को मात दो तो माने
मुर्दे को सांस दो तो माने
समन्दर खारा भरा पडा है
मीठा कर दो तो माने
मौत को मात दो तो माने ।।
धरती के धरातल पे
पाँव रखने की जगह नहीं
बढती हुई आबादी को,
नई धरती दिला दो तो जाने
मौत को मात दो तो माने ।।
आग का अविष्कार किया
जल से बिजली दी बना
मन ही मन देखो फूल गया
मस्तक ऊँचा लिया उठा
पर कब से जाने सूर्य खडा है
न किञ्चित भी अभिमान भरा
झूठे उठे इस मस्तक को
प्रेम सिखा दो तो जाने
मौत को मात दो तो माने ।।


सुशील कुमार 'पटियाल'
यह कविता नवम्बर ५, २००९ को ११AM पर लिखी गई थी

साथ क्या जायेगा

सोचो - साथ क्या जायेगा
मिली देह ये तन मिला,
ये भी यहीं रह जायेगा
सोचो - साथ क्या जायेगा ।।
साथ यहीं के यहीं रहेंगे
मर गया देखो, सभी कहेंगे,
चाहे कितना देह को सजाए जा
सोचो - साथ क्या जायेगा ।।
न संग जायेगा पैसा प्राणी
न बन मूर्ख तू अभिमानी,
बीजेगा जो आज यहां तू
कल फिर वापिस वही पायेगा,
सोचो - साथ क्या जायेगा ।।



सुशील कुमार पटियाल
दिनांक ०७-११-२००९ को लिखी गई यह कविता!

मेरा धर्म है मानवता

मेरा धर्म है मानवता
जो प्रेम प्यार सिखाता है,
धर्म नहीं है वह मेरा
दूरी दिलों में बढाता हैं ।।
फर्क है केवल सोच का
इसमें धर्म का क्या दोष था,
धर्म तो दिलों को मिलाता है
मेरा धर्म है मानवता,
जो बस प्रेम-प्यार सिखाता है ।।


सुशील कुमार पटियाल
दिनांक ०९-११-२००९ को लिखी गई यह कविता!

नेता की ज़ुबानी (व्यंग्य्)

साम दाम और दण्ड भेद
की नीति हम अपनाते हैं
कुर्सी से हमें प्यार बडा है व्यंग्य
न कत्ल करने से कतराते हैं
साम दाम और दण्ड भेद
की नीति हम अपनाते हैं।।
हम नेता हैं इस देश के
हम ही तो कर्णधार हैं
हम ही इन्सां हम ही देवता
सब जन अपना औज़ार हैं
खुल के खोलें वाणी अपनी
न कभी शर्माते हैं
साम दाम और दण्ड भेद
की नीति हम अपनाते हैं।।
हमसे ही तो हित देश का
दुनिया दीन लाचार है
हम जो कह दें हो जाता है
हम मुखिया, देश ये मूढ-गंवार है
दुनिया रोए या चिल्लाए
हम तो अपना राग बजाते हैं
साम दाम और दण्ड भेद
की नीति हम अपनाते हैं।।
रिश्वत की रेस (दौड) में
भागें किसी भी भेष में
अपना तो रिश्वत ही संसार है
हमें पैसे से वडा प्यार है
हम सेवा करेंगे, सेवा करेंगे
कहके, जनता को वहकाते हैं
साम, दाम और दण्ड भेद
की नीति हम अपनाते हैं।।

मोवाइल - ९२१०९८६५७५ (०४-११-२००९ को ४:४३ मिन्ट पर रचित)
सुशील कुमार पटियाल

सोमवार, 12 अक्तूबर 2009

सवाल

मेरे मन के मानचित्र पर
अनसुलझे है कई सवाल
क्यों काला कोई,
क्यों गोरा कोई,
क्यों मुखडा किसी का दिखता लाल
मेरे मन के मानचित्र पर
अनसुलझे है कई सवाल।।
कोई धनी तो कोई निर्धन क्यों है
क्यों उल्टी पडती वक्त की चाल
क्यों मांगता फिरता सडक पे कोई
भटके जैसे कोई चीज़ हो खोई
क्यों निर्धन है बदहाल
मेरे मन के मानचित्र पर
अनसुलझे है कई सवाल।।

दिल जलते हैं!

दीप कहीं, कहीं दिल जलते हैं
खुशियां कहीं, कहीं गम पलते हैं
कोई अकेला ही बढता है,
साथ किसी के दल चलते हैं
दीप कहीं, कहीं दिल जलते हैं।।
किसी किस्मत में है बस रोना
कोई बिना बजह ही हंसते है
दर्द का कहर न ढलता देखो
जीवन पल का, ज्यों वर्षों लगते हैं ।।

Thanks for loving me

Thanks for loving me

Bye bye dear

Bye bye dear